Friday, April 30, 2010

ईस्वर कौन ?

आये और देखें एक वाकया
एक दिन अस्पताल में एक दिल का रोगी आता है। उसको दिल का दौरा पड़ता है। रोगी गिर पड़ता है। डाक्टर कि निगाह पड़ती है और वह उसको बचने में जुट जाता है। दिल को बार-बार दबाता है और पम्प करता है, हवा देता है। फिर भी कुछ नहीं होता है। डॉक्टर परेशान व् हैरान, वह अन्य डॉक्टरों को बुलाता है। सभी जी-जान से उसे बचने के लिए जुट जाते हैं, उसके दिल को चलाने के लिए बिजली के झटके का सहारा लिया जाता है। अंत में वह बच ही जाता है।
मंदिर में वह बच सकता था ?
मंदिर एम् अगर वह धर दिया जाता तो पुजारी थोड़ी देर तक तो झाड़-फूक आदि का नाटक कर आदमी को इलाज के आभाव में मार देता।
आखिर भगवान कौन?
आदमी जिसने जान बचाई या फिर कोई और।

Thursday, April 29, 2010

kavita

लिखो लिख सकती हो तो
ऐसे ही अभ्याश बनेगा।
अपनी हो या परायी
कविता तो कविता है और रहेगी।।

देखिये भगवान कि ताकत

रमेश रोज मंदिर जाता है। संयोग से उसका व्यापर अच्छा चल रहा है। प्रतिदिन मंदिर जाने के कारन वह और लोग यही समझ रहे हैं की भगवान् कि महती कृपा है। उसके साथ-साथ अन्य लोग भी मंदिर जाने लगे। अब तो अच्छी खासी भीड़ लगने लगी थी। लोग प्रसन्न थे कि अब उनके समर्ध होने की बरी आने वाली है।

तभी एक दिन एक घटना होती है कि दो लडके अपनी मोटरसाईकिल से मंदिर कि तरफ जा रहे थे। सड़क के किनारे अपनी अपनी मोटरसाईकिल में बैठे- बैठे मंदिर के देवी-देवताओं को नमस्कार करने लगे। पीछे से आने वाले ट्रक ने उन दोनों को कुचल दिया। लोगो ने देखा और अस्पताल लेकर भागे। किन्तु कोई नहीं बचा। कुछ लोग वहां पर इकठ्ठा थे वे आपस में चर्चा करने लगे कि देखो कितने अच्छे बच्चे मर गए। वहीँ पर कुछा दूर खड़ा एक हमारा मित्र जो घटना को देख रहा था वह जोर-जोर से कह रहा था कि अर्चना करने पर भी जो देवी या देवता अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है वह किसी अन्य की क्या करेगा।

अब आपके सोंचने की बारी है कि एक देवी या देवता या भगवान को प्रणाम करने में मौत से बचने कि छमता नहीं है तो अन्य कार्य में मदद कैसे करेगा।



Friday, April 16, 2010

ईस्वर या इन्सान

एक दिन एक मंदिर में एक व्यक्ति की एक दुर्घटना में काफी ज्यादा चोटें लगी थी। खून बह रहा था। कोई भी उधर से गुजरता तो देखता और निकल लेता। एक व्यक्ति ऐसा भी आया जिसने उसे उठाया और अपने कपड़ों आदि की चिंता छोड़ कर उसे अस्पताल ले गया। मंदिर के किसी भी पुजारी या प्रबंधन ने जहमत नहीं उठाई कि उसे किसी भी अस्पताल में भारती करा दिया जाये। भगवन के दरबार में ऐसे लोगो का क्या स्थान । भगवान भी ऐसी स्थिति में नहीं कि उसे ठीक कर सके। जो व्यक्ति अस्पताल ले गया उसके कपडे भी ख़राब हुए लेकिन वह आदमी बच गया। अब सोंचो कि भगवान कौन हुआ।

वह आदमी या मंदिर का भगवान या मंदिर से भगवान का व्यापर करने वाले लोग।

Wednesday, April 14, 2010

इस्वर अँधा है?

इस देश का कानून अँधा है। न जाने कितने ही निर्दोसो को कानून सजा देता है। हम देखते है और जानते हुए भी विरोध नहीं कर पाते है। कानून भी बताते है की विकता है। जहाँ देश का भगवान् बिकता होगा, जाहिर सी बात है कि वहां क्या-क्या न बिकता होगा। जहाँ का कानून नहीं देखता होगा तो जरूर ईस्वर कि भी नजर नही कम कर रही होगी। इस देश का भगवान = कानून मन जाता है।

अब आप भी तो अपने चारो तरफ देखें और समझें कि क्या हो रहा है? क्या बिक रहा है?

जब भी सच को हाथ में लेकर देखेंगे तो आप भी समाज के विरोधी हो जायेंगे। लोग आप के खिलाफ खाने होगे और लाभ लेने वाले आप को भगवान का सच दिखने के लिए कानून से खेल रहे होंगें। आप कि स्थित क्या होगी, आप ही जानेंगे और आपको जानने वाले भी आप का साथ छोड़ कर चले जायेंगे। आप खुद ही देख लेंगे कि भगवान अँधा है। उसकी आँखे भी वही लोग है जो उसकी आँखों में पट्टी बांधने का कम कर रहे है.

Tuesday, April 13, 2010

ईश्वर का धंधा

भगवान क्या है?
तथाकथित धर्म के ठेकेदारों ने मानव जाती पर अपने एकाधिकार के लिए उसे भयभीत करने के लिए तथाकथित भगवान या ईश्वर की कल्पना को धरातल पर लाया। आदमी को भयभीत किया और उसके अज्ञात भविष्य को उससे जोड़कर उसके मस्तिस्क पर कब्ज़ा कर लिया।

तथाकथित भगवान का असर दिखाने के लिए छल भी किये गए और दिखाया गया कि ईश्वर है। किसी अज्ञात बहुत बड़ी विपदा को हम ईश्वर कह सकते हैं। जिससे डर कर उन धर्मावलम्बियों का हम अनुसरण करने लगे । हम यह भी कह सकते हैं कि वह भय जो हमें मानसिक रूप से बांध सके वाही भगवान या ईश्वर हुआ ।

जिससे डर कर हम कुछ धर्मावलम्बियों के कथनानुसार कार्य को करे। नहीं तो भगवान सत्यानाश करेगा। इस प्रकार जिस व्यक्ति से वह नहीं जीत सकते थे उसे मानसिक रूप से बंदी बना कर सोसन करने के बिम्ब को ही भगवान कहते हैं।

इश्वर का धंधा

इसके फायदा तो किसी न किसी को होना ही था और उठाया भी। बड़े-बड़े मंदिर बने । गुरूद्वारे बने। मस्जिद बने । इस धर्मं के धंधे के न जाने क्या-क्या बने। एक वर्ग उसी धर्मं का ठेकेदार बन गया। वाकायदा उसका व्यापर करने लगा। इसमें किसी का अधिकार न हो और न ही कोई इसका फायदा उठा पाए और न ही कोई उसका पद हथिया पाए। बकायदे इसके लिए उसने अपने पंजीकरण पुजारी के रूप में करवा लिया और घर परिवार को चलने लगा। ईश्वर के साथ-साथ अपने को भी पूजने लगा । उसका बच्चा भी पैदा होते ही पूजने के योग्य करार दे दिया।

जब समाज में वह और उसका परिवार पूजा जाने लगा तो लगिमी था की उसे मन की करनी ही थी और करने लगा। मंदिर में कुछ लोगो को मूर्ति देखने से ही मना कर दिया और कुछ लोगो से अधिक सामग्री लेकर उनको महत्व देने लगा। इस तरह अपने लाभा के लिए स्वयं भू भगवान ने भगवन से छल करना सुरु कर दिया । आज तो यह व्यापर बहुत आगे निकल गया है।

कुछ मंदिरों में तो हजारो रुपये देदो तो उनका गर्भगृह तक देख लो । इस प्रकार धर्मं का अच्छा खासा बिजनेस ही चल निकला है।

आप भी तो सोंचे। आप भी तो विचार करें। आप भी अपने आस-पास देखें ।







Tuesday, October 27, 2009

Who is God according me ?

I think that the God is human. Human create a alternate arrangement to the nature. It may be disturbed or not it was not responsibility of human. Now, you must also think about the God and Human. I publish a view that the relationship between the human & God. What is the name of the God or Who is the God. No, one is the God or no, any person may be say that I am God or I am the representative of the God. Because all animals are same in living.